कविता - अपना शहर....... (एक प्रयास)

Medhaj News 1 Aug 20 , 18:04:46 Special Story Viewed : 2830 Times
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1) धूप में पथिक...​
2) आओ फिर...
3) झुग्गियां...
4) पत्थर दिल...
5) हँसने दो .....
6) बया...
7) सावन की तीज....​


बहुत दिनों बाद 

घूम कर आई

अपने शहर में।

मिल आई

गली महोल्ले 

दालान झरोखों से

अपने शहर में।


घंटों तलाशे

गम यादें

बचपन की शरारतें

यौवन का अल्हड़पन

अपने शहर में।

कुछ था ,वहां

बुला रहा था पास

शोर में भी ,दे रहा आवाज

अपने शहर में।


पुराने मकान के

चौबारे में

धीमे से थामा था

किसी ने मेरा हाथ।

मैंने थीं नजरें घुमाई

सूरत कोई 

नजर ना आई।

अपने शहर में।


फूल पत्ते ,हवा पानी

पूछ रहे थे

क्या चाहती अब यहां?

मन ठिठका 

अंदर से बोला

छोड़ गई  पीछे जो

बरसों पहले

यादें आहटें अदब

बचपन रिश्ते नाम

तलाशने आई हूॅ

अपने शहर में।


जहाॅ मोहब्बत  झाॅकती

साथ को रोती

हर आंख थी।

बन गए, हम

 ब स,परछाई  वहां

 अपने शहर में।



---डा.बंदना जैन(कोटा,राजस्थान)----



मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें----> गुनगुनाती धुप और परिंदे......​


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