कविता - कच्ची धूप...(एक प्रयास)

Medhaj News 6 Aug 20 , 13:23:52 Special Story Viewed : 1855 Times
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1) धूप में पथिक...​
2) आओ फिर...
3) झुग्गियां...
4) पत्थर दिल...
5) हँसने दो .....
6) बया...
7) सावन की तीज....​
8) गुनगुनाती धुप और परिंदे......
9) अपना शहर.......


बचपन जैसी कच्ची धूप, 

चेहरे पर मुस्काती धूप। 

तन को कब ताजा कर जाती,

तड़के रोज जगाती धूप।

आंगन 
 रोज सुखा जाती 

पौधों को पनपाती धूप।

जब तीखे तेवर होते

आग बन झुलसाती धूप।

आज मकानों में देखो,

दूर से इठलाती  धूप।

यह भी पता नहीं चलता,

कब आती कब जाती धूप

पिछवाड़े के अंबुआ पर,

जाने कब चढ जाती धूप 

शाम झांकती खिड़की से

गुनगुन करके हसाती
 धूप। 

जाते जाते अपने घर

मन को सुखी बनाती धूप। 



---डा.बंदना जैन(कोटा,राजस्थान)----



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