कविता - सौंधी माटी

Medhaj News 10 Aug 20 , 16:34:39 Special Story Viewed : 2035 Times
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1) धूप में पथिक...​
2) आओ फिर...
3) झुग्गियां...
4) पत्थर दिल...
5) हँसने दो .....
6) बया...
7) सावन की तीज....​
8) गुनगुनाती धुप और परिंदे......
9) अपना शहर.......
10) राखी...


क्यों सौंधी माटी छोड़ चला,

क्यों परदेश की ओर चला।

जिस धरती ने था जन्म दिया,

क्यों उससे नाता तोड़ चला।


सुन्दर सुखकर घर बार यहां,

मात-पिता की छांव यहां।

है फूलों से खिलते रिश्ते, 

सब हैं कितने मिलते जुलते।


यौवन की मस्त उड़ाने हैं,

मीठे सपने मस्ताने हैं।

कमी नहीं रोटी रोजी की,

सब कुछ जाने पहचाने हैं।


सिर पर वृद्धों का हाथ यहां,

इक दूजे का साथ यहां।

यहां पर्वों की परिपाटी है,

सौंधी स्वदेश की माटी है।


माना अल्प सुख पैमाने हैं,

वैभव भी तो सुहाने हैं।

पर सच्चा सुख है अपनों में,

जो देखे तूनें सपनों में।


इस माटी का तुझ पर ॠण है,

घर के आगे सब कुछ तृण है।

आ जा बेटे लौट वतन,

भर दे खुशियों से सबका मन।



---डा.बंदना जैन(कोटा,राजस्थान)----



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