कविता - झुग्गियां... (एक प्रयास)

Medhaj News 9 Jul 20 , 12:38:10 Special Story Viewed : 6015 Times
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1) धूप में पथिक...​

2) आओ फिर...



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तंग गलियों के बंद दरवाजों में,

झुग्गियों के हालातों में

कितनी घुटन समाई है

यह अर्थ की मुम्बई है।

*गरीबों को कहाँ रास आई है।

रोज बढ़ती उलझनें,

जड़ नहीं कटते तनें हैं।

गंदगी धुआं धूल से सने हैं।

यह अर्थ की मुम्बई है

*गरीबों को कहाँ रास आई है।


फुदकते पंछी यहां कहाँ

छप्पर से सजे घर यहां वहाँ।

झूम कर बादल नहीं आते यहां

मस्त मौसम भी बैरूख है यहां।

यह अर्थ की मुम्बई है

*गरीबों को कहाँ रास आई है।

चिथड़ों से ढकी जिन्दगी गरीबों पर लोटते मकड़ी के जाले हैं

तन -मन निर्बल बोझिल सा

मासूमों की हिल रही जिन्दगी।

यह अर्थ की मुम्बई है

*गरीबों को कहाँ रास आई है।


चूर चूर होते सपनों को,

पैबंदों से सिल रही है।

जिन्दगी मुम्बई की झुग्गियों की,

,हादसों से गले मिल रही है।

यह अर्थ की मुम्बई है

*गरीबों को कहाँ रास आई है।

अनजाना सा हर त्यौहार,

चुपचाप चला-चला जाता है।

पसरा है हर ओर अँधेरा,

उजाला कहाँ रास आता है।

यह अर्थ की मुम्बई है

*गरीबों को कहाँ रास आई है।



----डा,बंदना (कोटा,राजस्थान)----



 


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