कविता - मौन की व्यथा (दया संग्रह)

Medhaj News 8 Jul 20 , 17:45:25 Special Story Viewed : 22940 Times
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मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें--:

1) ऐ जिंदगी तू कितनी खूबसूरत है

2) शर्मिन्दा हूँ फिर भी मै जिन्दा हूँ

3) वफ़ादारी

4) कोरोना और मजदूर (दया संग्रह)

5) गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुसाक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः



ज़िन्दगी ने पूछा- 'आप इतना चुप क्यों है?'

मैंने नज़रे उठाई-मन को टटोला,

उत्तर देना था तो कुछ इस तरह बोला-


'ऐ ज़िन्दगी', चाहता तो बहुत हूँ कि मैं भी कुछ बोलूं,

मन की भावनाओ को आपके समक्ष खोलूं,

एक-आध प्रयास भी किया, पर विफल रहा,

विचारों को शब्दों का जामा पहनाने में;


और जब-जब विचारों को शब्दों में गढ़ा,

ज़माने ने उसे उल्टा ही पढ़ा;

क्योंकि जब भी बोलना चाहा-

दिन पर, रात पर, मौसम के तुषारापात पर,


अपनी आस्था पर, समाज की अव्यवस्था पर, विदेश की नीति पर,

देश की राजनीती पर, सुबह पर, शाम पर, शायर के कलाम पर,

नियम पर, कानून पर, जीने के जूनून पर, धर्म पर, अधर्म पर,

मानवता के मर्म पर; सब ने कहा- साला बेवकूफ है।


बेईमानी की नदी में, ईमानदारी की नाव चलाना चाहता है,

खुद तो डूबेगा ही हमें भी डुबाना चाहता है;

इसके बाद मैं क्या बोल सकता हूँ?

मौन रहने में ही भलाई समझता हूँ, 


क्योंकि मुझ पर भी आप की तरह परिवार की जिम्मेदारी है.

गलती सिर्फ इतनी है कि मैं रोटी खाकर संतुष्ट होना चाहता हूँ,

और खून के आँसुओं से सींचकर अपने अरमान पूरा करना चाहता हूँ,

इसीलिए मैं मौन हूँ और भीड़ मे भी कोई नहीं जानता कि मै कौन हूँ?



आपकी समीक्षाओं/ प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा में--->

---श्री दया प्रकाश पाठक ---



 


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