कविता - स्वप्न यही

Medhaj News 24 Jul 20 , 15:10:06 Special Story Viewed : 4321 Times
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1) गंगा की पावन धारा में

2) एक साँझ और ढल गई​



पग-पग करना हमें उजाला,स्वप्न यही ।

मंत्र पूत हो, प्राण शिवाला, स्वप्न यही ।


मंदिर - मंदिर , राम विराजे,जाग उठो,

छंँट जाये अब,मन से जाला,स्वप्न यही ।


सब धर्मों का, मंत्र एक है, मान चलो,

भूखे को भर,पेट निवाला,  स्वप्न यही ।


दर्द असीमित,बलिदानों की नीति छले

मिटे हनन की,रीति कराला,स्वप्न यही ।


मात-पिता की, सेवा करना, बोध रहे,

स्नेह शीश पर,रहे विशाला, स्वप्न यही ।


निराधार है, मद की दुनिया,भान करो,

खुले ज्ञान की,नित मधुशाला,स्वप्न यही । 


अनासक्ति हो, दर्प मान पर, शास्त्र कहें,

प्रेम हृदय पर, लगे न ताला, स्वप्न यही ।




-----------डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी-----------


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