कविता - कांटे बनकर चुभ जाना

Medhaj News 6 Sep 20 , 16:01:12 Special Story Viewed : 10194 Times
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न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा

हमारे पाँव का काँटा बस हमीं से निकलेगा


कांटे बनकर चुभ जाना ही ,

तेरी आदत में रहा मुकमल ,

दर्द दे के खुश हो जाना ही ,

तेरी फितरत में रहा है सदा।


तेरे वादों  का जिक्र जब हुआ ,

बस शर्तो का ही एहसास हुआ ,

मेरी खुशियों का ढेर रेत बनके,

बस जमीं में दफ़्न होता रहा।


बस तुम दिखावा करती रही ,

निशाँ-प्रेम अपने जज्बात की ,

मै सच-ये-इबादत करता रहा,

तेरी झूठ -फरेब एहसास का।


कांटे बनकर चुभ जाना ही ,

तेरी आदत में रहा मुकमल



-----अजय (H.O)------



मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें----> मेरे जाने का किसी को, जमाने में थोड़ा भी गम होता​


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    Comments

    • Bahut sunder

      Commented by :Dr Bandana jain
      11-09-2020 10:27:26

    • Very nice,beautiful

      Commented by :Dr Bandana jain
      08-09-2020 15:11:43

    • Very Nice

      Commented by :BHUPENDRA MAHAYACH
      08-09-2020 14:31:48

    • Beautiful

      Commented by :Rohit Deo
      07-09-2020 16:14:48

    • Nice..

      Commented by :Sameer Siddiquee
      07-09-2020 08:15:31

    • Nice line

      Commented by :Aslam
      06-09-2020 20:08:01

    • Nice lines...........

      Commented by :Deependra Yadav
      06-09-2020 18:05:32

    • Heart touching lines

      Commented by :Md Nazir
      06-09-2020 16:35:03

    • Bahut khub

      Commented by :Lalit
      06-09-2020 16:24:30

    • Nice ....lines

      Commented by :Ashish
      06-09-2020 16:13:12

    • Nice line

      Commented by :Raghunath Patra
      06-09-2020 16:04:55

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