कविता - कांटे बनकर चुभ जाना

Medhaj News 6 Sep 20 , 16:01:12 Special Story Viewed : 7814 Times
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न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा

हमारे पाँव का काँटा बस हमीं से निकलेगा


कांटे बनकर चुभ जाना ही ,

तेरी आदत में रहा मुकमल ,

दर्द दे के खुश हो जाना ही ,

तेरी फितरत में रहा है सदा।


तेरे वादों  का जिक्र जब हुआ ,

बस शर्तो का ही एहसास हुआ ,

मेरी खुशियों का ढेर रेत बनके,

बस जमीं में दफ़्न होता रहा।


बस तुम दिखावा करती रही ,

निशाँ-प्रेम अपने जज्बात की ,

मै सच-ये-इबादत करता रहा,

तेरी झूठ -फरेब एहसास का।


कांटे बनकर चुभ जाना ही ,

तेरी आदत में रहा मुकमल



-----अजय (H.O)------



मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें----> मेरे जाने का किसी को, जमाने में थोड़ा भी गम होता​


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