कविता - धूप में पथिक...(एक प्रयास)

Medhaj News 5 Jul 20 , 18:16:14 Special Story Viewed : 10832 Times
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जेठ की दोपहरी में,

पथिक जा रहा था अकेला।

पसीने से बनी नदी दूर तक

कर रही थी पीछा।

उसे बता रही थी कि,

दुनिया है पानी पानी

यही तो है जिन्दगानी।


मैं घर के झरोंके से झाँक

रही थी खड़ी,

मन भी अधीर हो रहा था

घड़ी घड़ी।

उसने मेरी ओर खाली हाथ बढ़ाया

दे दे कुछ खाने को,बतलाया

तेरा भला करेगें भगवान

सुबह से कुछ नहीं है खाया

कैसी है प्रभु तेरी माया।


मैंने उसे बुलाया,

बैठाकर खाना खिलाया

मटके का शीतल जल पिलाया।

फिर, उसे एक छाता दिया लाकर

बहुत खुश हुआ, वह सब पाकर।

छूकर बोला, वह मेरे पाँव

मिल गई मुझे तेरी आँचल की छाँव।

यह छाता हरदम मुझे तेरी याद दिलाएगा

अब सूरज तो क्या,

यह जग भी मेरा कुछ नहीं

बिगाड़ पाएगा।



----डा,बंदना जैन(कोटा)----



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