कविता - जाने कैसे?

Medhaj News 13 Jul 20 , 13:37:29 Special Story Viewed : 9840 Times
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मेरी खामोशियाँ को भी,

जाने कैसे सुन लेते हो तुम?

कभी-कभी महसूस करते हो सिर्फ,

तो कभी-कभी आँखो से भी कह देते हो तुम।

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हम तो अभिव्यक्ति में,

बहुत कच्चे हैं यार;

पर कम नहीं तुम भी कुछ,

जाने कैसे इतना चुप रह लेते हो तुम?


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जानते हैं हम कि तुम्हारे दिल में भी,

मचती हलचल है;

पर फ़िर भी क्यों अपने लबों को,

सिल लेते हो तुम?

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जानते हैं कि मुस्कुराहट तुम्हारी,

गुमराह कर देती है लोगों को;

पर खुद के साथ अकेले में,

कभी-कभी रोते हो तुम।


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तुम्हारी इस अदा पर तो,

मैं सौ बार सदके जाऊँ;

कि खुद को जलाकर गमों की तपिस में भी,

सबको खुश रख लेते हो तुम।

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तुम्हारीं खुशियों के लिये तो हम,

खुद को भी दूर करदे तुमसे;

अगर तुम झूठ भी कह दो कि-

किसी और के साथ ज्यादा खुश रह लेते हो तुम।


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जानते हैं हम कि-

मन से मेरे ही जैसे हो तुम;

शायद इसीलिए बिन कुछ कहे भी,

मेरे मन को मोह लेते हो तुम।

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--(भावना मौर्य)--



मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें---->ज़िन्दगी और एक सवाल?​


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