कविता - वफ़ादारी (दया संग्रह)

Medhaj News 1 Jul 20 , 15:37:55 Special Story Viewed : 21189 Times
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मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें--:

1) ऐ जिंदगी तू कितनी खूबसूरत है

2) शर्मिन्दा हूँ फिर भी मै जिन्दा हूँ



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मेरी वफ़ादारी पर कभी शक मत करना,

क्योंकि मैं वफादार हूँ और रहना चाहता हूँ वफादार बनकर |

कम से कम उस एक के प्रति जिससे चल रहा है,

मेरे जीवन का सफर |


मैं तुम्हारी वफ़ादारी पर शक नहीं करता,

क्योंकि तुम तो पहले से ही वफादार हो;

अपने बच्चों के प्रति, अपनी महत्वकांक्षाओं के प्रति,

अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रति, तो फिर क्यों पड़ती जा रही है धूमिल?


तुम्हारी ये वफादारी उन कर्तव्यों के प्रति, जिसे ओढ़कर-पहनकर

जिस पर चलकर तुमने अपनी महत्वकांक्षाओं को नया आयाम दिया,

अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाई है |

उसी से तो तुम्हारे बच्चों के गुलाबी गालों पर छाई अनछुयी ललाई है ||




आपकी समीक्षाओं/ प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा में--->

---श्री दया प्रकाश पाठक (दया संग्रह)---



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