लिखता हूँ……

मैं  पलटकर, एक किताब लिखता हूँ;,

मैं फिर से, एक ख्याल लिखता हूँ।


हिस्सों में, किस्सों को लिखता हूँ;

कुछ अपनी, तो कुछ दूसरों की लिखता हूँ।


तोड़ के, जोड़ के, एक कहानी लिखता हूँ;

थक जाता हूँ शाम को, तो सुबह को लिखता हूँ।


कुछ होश में, तो कुछ खुमारी में लिखता हूँ;

कुछ अनकही सी, तो कुछ अनसुनी सी लिखता हूँ।


लफ़्ज़ों को शब्दों में, पिरो के लिखता हूँ;

कुछ समझ के, तो कुछ बिना समझे ही लिखता हूँ।


कुछ फासलों को, दूरियों में बदलकर लिखता हूँ,

किसी लम्बी बात को छोटी करके लिखता हूँ,


लिखता हूँ बहुत सारे सवाल,

फिर उन सवालों के मतलब समझ के उनके जवाबों को लिखता हूँ।

मिलता-जुलता है मेरा ख्याल, हर किसी के ख्याल से;

औरों के ज़ज्बातों को भी सुन के लिखता हूँ।


कुछ अधूरी सी, तो कुछ पूरी सी लिखता हूँ;

जो मुकम्मल नहीं, वही एक बात बार-बार लिखता हूँ।


         --( प्रज्ञा शुक्ला)--


( फासला- Emotional Distance, दूरियां-Physical Distance)


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