कविता - बुढ़ापे को क्यों बुलाना

कविता - बुढ़ापे को क्यों बुलाना

उम्र तो बढ़ ही रही है,

पर बुढ़ापे को क्यों बुलाना |

करते रहो नादानी कभी कबार,

बचपने को क्यों भुलाना ||

आने दो बालों में सफेदी,

सफेदी से क्या घबराना |

सारी उम्र दी है जिसके लिए,

वह तो है बेशकीमती खजाना || 


बाल भले हो जाए कम,

पर हौसले को मत गवाना | 

जब भी देखो किसी हसीना को,

तो उसे अपनी जिंदादिली दिखाना || 

दांँत जब टूट जाएगा,

तब मुस्कुराहट किस को दिखाना | 

जब तक है बत्तीसी सलामत,

तब तक खूब हँसना और हंँसाना || 


जब घुटने दर्द करने लगेंगे,

तब सोचोगे कैसे जीवन बिताना | 

जब तक है पैरों में दम,

तब तक तो खूब नाचना और नचाना || 



     स्वरचित

---ललित खंडेलवाल---


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