शनिदेव से जुडी कुछ ख़ास बातें

शनिदेव

शनिवार का दिन शनिदेव का दिन माना जाता है और इस दिन शनिदेव के साथ ही पीपल के पेड़ और हनुमान जी की पूजा करना भी शुभ माना जाता है। शनिदेव को ग्रहों की पूजा में भी शामिल किया जाता है क्योंकि शनि ग्रह भी हैं। शनिदेव की पूजा अकसर लोग भय के कारण करते हैं ताकि उनके जीवन में किसी प्रकार का अनिष् हो लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है शनिदेव कर्म प्रधान देवता हैं जो कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इनके विषय में मान्यता है कि ये पल भर में रंक को राजा और राजा को भी रंक बना सकते हैं। ज्योतिष में शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है।

शनिदेव सूर्यदेव के पुत्र हैं और इनकी माता का नाम छाया है। शनिदेव की पूजा सूर्योदय से पहले या फिर सूर्यास्त के बाद ही की जाती है। शिव जी शनिदेव के गुरु हैं इसलिए शिव जी की पूजा आराधना करने वाले पर शनिदेव अपनी कुदृष्टि नहीं करते हैं। रावण ने शनि देव को बंदी बनाकर रखा था तब शनि देव की पीड़ा कम करने के लिए हनुमानजी ने उनको तेल लगाया था तभी से शनिदेव ने वचन दिए था के हनुमान भक्तों पर अपनी अशुभ दृष्टि नहीं डालेंगे। इनका वर्ण काला है और ये नीले वस्त्र धारण करते हैं। ये गिद्ध पर सवारी करते हैं। इनके एक हाथ में धनुष तो दूसरा हाथ वरमुद्रा में रहता है। इनका अस्त्र लोहे का इसलिए लोहा इनकी धातु मानी गई है।शनिदेव सभी ग्रहों में सबसे धीमी गति से भ्रमण करने वाले ग्रह हैं।

जब सूर्य देव और माता छाया को शनिदेव की प्राप्ति हुई तब शनि देव के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य देव ने उनको अपना पुत्र स्वीकार किआ। ये सुनकर शनिदेव क्रोधित हो गए।  उन्होंने शंकर भगवान् की  तपस्या की। शंकर भगवान् उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उनको वर मांगने को कहा। तब शनिदेव ने वर माँगा के वे अपने पिता से ज्यादा पूज्य बने ताकि उनका अहंकार टूट जाए। भगवान शिव ने शनिदेव को वरदान दिया कि वे  नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ होगे और  न्यायाधीश एवं दंडाधिकारी रहेंगे और वे ही लोगों को उनके कर्मों के अनुसार दंड देंगे।

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