मनोरंजनकवितायें और कहानियाँ

रूहानी मन

अनंत प्रेम के सागर में,
डूब जाने को मन करता है,
जहाँ मिलन हो एहसासों का,
न हो शरीर की ज़रूरत,
ऐसे जहाँ में बस,
जाने का मन करता है।

कभी-कभी खुद के लिए भी,
मुस्कुराने का मन करता हैं,
किस अनजाने को भी अपना,
मान जाने का मन करता हैं।
जिससे रिश्ता हो सिर्फ ज़ज़्बातों का,
ऐसी रूह में समाने का मन करता हैं।

जानते हैं कि कुछ राहों की,
कोई मंज़िल नहीं होती;
फिर कभी-कभी उन राहों पर,
कदम बढ़ाने का मन करता हैं।
कुछ पल भूल कर मन का अंतर्द्वंद,
न जाने क्यों नामुमकिन को,
मुमकिन बनाने का मन करता है ।

जीते तो हर पल हैं सभी के लिए,
पर कुछ पल खुद के लिए भी,
चुराने का मन करता हैं।
हम ढूँढ़ते हैं जहाँ वो,
जहाँ न बंधन हो कोई;
जहाँ दुनिया-जहां को भी,
भूल जाने का मन करता हैं
अपने लिये भी एक अलग,
दुनिया बसाने का मन करता है।
★★★★
—–(Copyright@भावना मौर्य “तरंगिणी”)—-
(Cover Image Source: pixbay.com)

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