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सप्त ऋषियों की कहानी

जब पृथ्वी पर अधर्म और अनर्गलता का प्रचंड विकर्ष था, उस समय एक समृद्ध राजा था जिसका नाम धनुष था। धनुष राजा ने अपने राज्य को न्याय और सद्गुणों से भर दिया था, लेकिन उसकी सुख-शांति अधूरी थी, क्योंकि उसके मन में अज्ञान और आत्मग्लानि की बातें हमेशा घूमती रहती थीं।

एक दिन, धनुष राजा ने अपने परम सचिव से कहा, “मुझे ऐसा धर्म का ज्ञान चाहिए जो मेरे मन को शांति दे सके और मेरे अंतरात्मा को समझा सके।” सचिव ने समझाया कि इसके लिए सप्त ऋषियों की तपस्या और उनके दर्शन की आवश्यकता है।

फिर धनुष राजा सप्त ऋषियों की तलाश में निकल पड़ा। उन्होंने अनेक हिंदू धार्मिक ग्रंथों से सुना था कि ये ऋषियां भगवान ब्रह्मा के मनस्पुत्र हैं और उनका तपस्या का बल अत्यधिक होता है।

ऋषियों की तपस्या की गुफा में पहुँचकर, धनुष राजा ने उनका सत्कार किया और उनसे धर्म के बारे में सीखने की प्रार्थना की। ऋषियों ने राजा की ईच्छाओं को समझते हुए, उन्हें अद्वैत वेदांत के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उपदेश दिया।

उन्होंने कहा, “धनुष राजा, तुम्हें सच्चे धर्म का ज्ञान हासिल करने के लिए आत्मा को जानना होगा। आत्मा ही वह अच्छाई, सत्य और प्रेम का स्रोत है जिससे समाज में सुख-शांति बनी रह सकती है।”

धनुष राजा ने ऋषियों के शिक्षाओं का पालन किया और उनके उपदेशों के मार्ग में चलने लगा। उसकी आत्मज्ञान में वृद्धि होने लगी और उनका मन शांति से भर गया। धनुष राजा ने राज्य में न्याय की प्रणाली स्थापित की और अपने प्रजाओं के साथ न्यायपूर्ण और धार्मिक जीवन जीना सिखाया।

इस प्रकार, सप्त ऋषियों के आदर्श उपदेशों ने धनुष राजा की जीवन में सच्चे धर्म की प्राप्ति की और उसने अपने राज्य को धर्म, न्याय और प्रेम से भर दिया। इस प्रकार, सप्त ऋषियों की कहानी हमें यह सिखाती है कि आत्मज्ञान और धर्म के मार्ग से ही समाज में सच्चे उद्धारण की जा सकती है।

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