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मौत की अधूरी कहानी-इंद्रा और हॉस्पिटल

तारीख थी 31 अक्टूबर १९८४ -एक पुलिस का कांस्टेबल सफदरजंग हॉस्पिटल की इमर्जेंसी से दौड़ता हुआ आया- और चिल्लाया साहब जल्दी चलो, इंदिरा गांधी को कुछ हो गया है’। साहब प्रथम तल से इमर्जेंसी में आये , तभी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लाए ही थे साथ में थे माखनलाल फोतेदार ,आरके धवन । लेकिन ये आज तक मसला उठता है जब स्वर्गीय इंदिरा गाँधी को , हॉस्पिटल लाये थे तब वह जिन्दा थी या मृत। यह मामला कोर्ट में भी उठाया गया था।इंदिरा गाँधी को इतनी गोलियां लगी थीं तो कैसे जिंदा रह सकती हैं? वकीलों ने सवाल भी किए? असल में यह होता है कि जब भी कोई आदमी एक्सीडेंट या खून से लथपथ आता है तो डॉक्टर का पहली कोशिश होती है कि पहले इसका हार्ट चलाने की कोशिश करें । सांस देने की कोशिश करें ।वही उस डॉक्टर्स/ डॉक्टर ने किया, तुरंत गले में ट्यूब डालकर सांस देना शुरू कर दिया। डॉक्टर के लिए इंसान तब तक ज़िंदा रहता है जब आर्टिफिशियल रेसपिरेशन देना बंद कर देंगे। कई प्रोफेसर थे वहां पर, उन्हें लेकर ऑपरेशन थिएटर में चले गए। देखा गया, कोशिश की गई। खून चढ़ाया गया। 2.20 बजे के आसपास उन्होंने सोचा कि अब किसी भी तरह का कोई रिवाइवल संभव नहीं है। फिर डेथ डिक्लेयर किया गया। होता क्या है कि ऐसे काफी मरीज वापस आ जाते हैं। आपने फिल्मों में भी देखा होगा कि हार्ट पर दबाव देते हैं और हार्ट बीट चल जाता है। जब इंद्रा गाँधी डेथ डिक्लेयर हो गई तब पोस्टमॉर्टम शुरू हुआ । दो टिपिकल चीजें थीं। पहला रिक्वेस्ट था कि इन्हें मॉर्चरी में न ले जाया जाए। वैसे, ऐसा कोई कानून नहीं है कि पोस्टमॉर्टम मॉर्चरी में ही करना है। बहुत बार डॉक्टर साइट पर भी जाकर कर देते हैं। डॉक्टर अपनी सुविधा के लिए मॉर्चरी में जाते हैं। तब डॉक्टर ने तय किया कि ऑपरेशन थ्रेटर में ही पोस्टमार्टम किया जाये । लोगो अनुरोध यह था कि इन्हें तीन दिन लोगों के दर्शन के लिए रखना है इसलिए सिर के हिस्से को नहीं खोला जाये। असल में सिर को खोलेंगे तो फेस डिसफिगर हो जाता। अगर आपने उनकी मृत फोटो देखी होगी तो उनके चेहरे पर सूजन थी। ब्लड काफी निकला था, शॉक लगा था। बॉडी खराब न लगे इसलिए स्कल न खोलने का अनुरोध लिखित तौर पर किया गया था। इंद्रा गाँधी के सारी चोटें घुटने और ब्रेस्ट के बीच में थीं। क्लिनिकली भी हार्ट या लंग्स इंजरी का कोई सबूत नहीं था। इसलिए डॉक्टर ने स्कल नहीं खोला। बाकी चेस्ट और एबडॉमिन को खोलकर मौत का कारण बताया। दो चीजें अहम थीं। एक तो उन्हें कितनी गोलियां लगीं। दूसरा, किस चोट से मौत हुई। ये जरूरी होता है कि जिस आदमी को चोटें लगी हैं वो उसे नैचरल कोर्स में डेथ के लिए पर्याप्त हों। सामने से गोली जाकर लिवर को नुकसान करते हुए बैक में स्पाइनल कॉर्ड में लगी थी। यह डेथ की वजह हो सकती है। डॉक्टर ने यही बताया। ३१ गोलियां इंद्रा गाँधी को लगी थी । वैसे तो करीब 50-55 गोलियां चली थी। 4 बुलेट में से दो तरह की गोलियां थीं, जो बॉडी में फंसी हुई थीं। 6 गोलियां एक तरह की थीं, बाकी 24 दूसरी तरह की थीं। अब अस्पताल के चारों ओर लाखों लोग आ गए थे।एविडेंस के लिए गोलिया निकलना बहुत जरुरी था ताकि उसे मिलाया जा सके बन्दुक कि गोली से। गोली स्पाइनल कॉर्ड में इस तरह से फंस गई थी कि उसे निकालते तो गोली टूट जाती। केवल दो बुलेट ऐसी थीं जिसे डॉक्टर निकाल सकते थे। जो गोली शरीर से निकाली गई है। वह एक पिस्टल से चली थी और एक स्टेन गन से चली थी। दूसरे दिन डॉक्टर के पास फ़ोन आया। कि सफदरजंग रोड पहुंच जाइए इंदिरा जी के घर जंहा घटना घाटी थी । खोखे वहीं थे। वंहा मिले खोखे और और पोस्ट मार्टम में एक गोली कम थी क्योकि एक खोखा ज्यादा मिला था । अब डॉक्टर यह सोच रहे थे कि एक गोली कान्हा गई

दूसरे दिन डॉक्टर के पास फोन आया। कि सफदरजंग रोड पहुंच जाइए इंदिरा जी के घर जहां घटना घाटी थी। खोखे वहीं थे। वहां मिले खोखे और पोस्टमॉर्टम में एक गोली कम थी, क्योंकि एक खोखा ज्यादा मिला था। अब डॉक्टर यह सोच रहे थे कि एक गोली कहाँ गई?

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