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एहसासों की डोर

हर लम्हां ना जी पाने की,
कसक सी लगती है,
सब कुछ कह लेने पर भी,
कुछ हिचक सी लगती है;
पास रहने पर भी लगता है कि,
हैं मीलों की दूरियाँ,
पर जब दूर तुम होते हो,
तो मुझे तेरी महक सी लगती है;

ज़ज्बातो को बयाँ करने में,
कुछ कमी सी लगती है,
जलता है सूरज पर,
कुछ नमी सी लगती है;
कहने को तो कुछ सालों-
का ही रिश्ता है हमारा,
पर तेरे घर की ये धरती मुझे,
अपनी सरज़मी सी लगती है;

एहसासों की डोर से,
बँधे हैं हम एक-दूजे से,
पर तेरी गैर-मौज़ूदगी मैं,
जिंदगी थमी सी लगती है;
हर एक पल मेरी आँखे,
ढूँढती रहती हैं तुझी को,
और तेरे आगोश में आते ही,
पूरी हुई हर कमी सी लगती है;

प्यार का एहसास अगर,
होता है अकेलेपन में,
तो कभी-कभी ये दूरी,
ज़रूरी सी लगती है;
तू सामने रहे और,
निहारती रहूँ तुझे मैं,
तेरे हँसने पर ये दुनिया,
सिंदूरी सी लगती है;

तेरा हाथ थामे-थामे,
बीत गये इतने बरस,
अब तेरे बिना ये जिंदगी,
अधूरी सी लगती है;
तेरा प्यार और विश्वास ही-
तो हिम्मत है मेरी,
तेरे होने पर जीवन में घुली हो,
कस्तूरी सी लगती है।
*********
—(Copyright@भावना मौर्य “तरंगिणी”)—
*(Image Source: yourquote/restzone)

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