विशेष खबर

जब चीन में हुआ गौरैयो का कत्लेआम, तो करोड़ो लोगों को जान देकर चुकानी पड़ी कीमत – मेधज न्यूज़

आज से लगभग 60 साल पहले चीन के हुक्मरानों ने एक ऐसा फैसला लिया कि पूरा पर्यावरण हिल गया था। उन्होंने देश से गौरैया (sparrow) खत्म करने की मुहिम चलाई। चीन में 1958 से 1962 के दौर को ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ कहा गया है। दूसरे शब्दों में इसे नर्क का दौर भी कहा जाता है। चीन (China) में खोज-खोजकर गौरैया मारी गई (Kill a Sparrow Campaign). यहां तक कि उन्हें मारने पर इनाम घोषित था। साल 1958 में एक ऐतिहासिक अकाल आया, जिसके चलते लगभग सवा तीन करोड़ लोगों की मौत हुई।

कई बार तानाशाही सोच रखने वाले नेता कुछ ऐसा कर जाते हैं, जिसका ख़ामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है। जब पूरी दुनिया कोरोना (coronavirus) के संकट से जूझ रही है, तभी चीन (China) फैसला लेता है कि वो अपने यहां से बहने वाली मेकांग नदी (Mekong river) का बहाव कम कर देगा। इससे 4 देशों- लाओस, कंबोडिया, वियतनाम और थाइलैंड में सूखे की नौबत आ चुकी है। चीन की निर्ममता की ये अकेली मिसाल नहीं, ऐसा ही कुछ हुआ था चीन में. चीन के पिछले सौ सालों के इतिहास को देखें तो कई चीनी नेताओं के कुछ फैसले देश को कई दशक पीछे ले गए थे। ऐसा ही एक फैसला चीन से गौरेया चिड़िया को खत्म करने का जिससे कि पूरा पर्यावरण हिल गया था। उन्होंने देश से गौरैया (sparrow) खत्म करने की मुहिम चलाई। इस एक गलती की सजा चीन के सवा तीन करोड़ लोगों को मिली, जिन्हे अपनी जान गंवानी पड़ी थी। आइए समझते हैं पूरा मामला क्या था…

डच इतिहासकार फ्रैंक डिकोतर ने अपनी किताब “द ग्रेट फेमिंस इन माओज़ चाइना” की शुरुआत इसी शक्तिशाली वाक्य से की है।

डिकोतर ने चीन के उस दौर का बयान किया है, जिसे ‘द ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ कहा जाता है। तब वामपंथी चीन की नींव रखने वाले माओत्से तुंग ने समूचे चीन को पश्चिमी देशों के क़रीब पहुँचने की विकास की दौड़ में धकेल दिया था। ऐसा उन्होंने सामूहिक खेती और तीव्र उद्योगीकरण के ज़रिए किया।

ये थी वजह
दरअसल 1958 में माओ जेडोंग (Mao Zedong), जिसे माओत्सेतुंग के नाम से भी जाना जाता है, ने एक मुहिम शुरू की. Four Pests Campaign नामक इस मुहिम के तहत नुक़सान पहुंचाने वाले 4 जीव-जंतुओं को मारने का फैसला हुआ- चूहे, जिनसे प्लेग फैलता है, मच्छर क्योंकि वे मलेरिया फैलाते हैं और मक्खियां जो कि हैजा फैलाती हैं इनके साथ चौथी थी गौरैया. जेडोंग का मानना था कि ये चिड़िया फसल के दाने खा जाती है जिससे काफी नुकसान हो रहा है। पहले उन्होंने चूहे, मच्छर और मक्खीयों को नष्ट करने के लिए पूरी ताकत लगाई, और फिर गौरेया को खत्म करने की रणनीति बनाई।

प्राकृतिक इतिहास लेखक जिम टोड के मुताबिक, गौरेया को इस सूची में शामिल इसलिए किया गया क्योंकि वह बहुत अनाज खाती थी। माओ का विचार था कि अनाज सिर्फ इंसानों के लिए होना चाहिए, गौरेया के लिए नहीं। जल्द ही न गौरेया को हटाने यानी खत्म करने के लिए अभियान चलाया गया। लेकिन चीन ने गौरेया को खत्म करने की बहुत बड़ी कीमत चुकाई।

दूतावास के बाहर दिया धरना
धीरे-धीरे हर उम्र और पेशे के लोग जेडोंग की नजरों में आने के लिए गौरैया मारने में जुट गए। कुछ वक्त बाद इस नन्ही चिड़िया को समझ आया कि कहां छिपा जा सकता है। इनका बड़ा सा झुंड पीकिंग के पोलैंड स्थित दूतावास में जा घुसा। पोलिश अधिकारियों को इस छोटी चिड़िया से कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने गौरैया का पीछा कर रहे लोगों को दूतावास के भीतर आने से मना कर दिया। लेकिन जिद पर आए लोगों ने तब भी पीछा नहीं छोड़ा। वे दूतावास के बाहर बैठकर थालियां और ड्रम पीटने लगे।

2 दिन और 2 रात लगातार ये शोर हुआ। शोर से घबराया झुंड दूतावास की छत पर ही उड़कर टकराने लगा और आखिरकार दम तोड़ दिया। बाद में दूतावास में काम करने वाले लोगों ने फावड़े और बेलचे ले-लेकर मरी हुई चिड़ियों को बाहर फेंक दिया। आज भी गौरैया मारने के इस अभियान को दुनिया के सबसे बड़े environmental disasters (पर्यावरण की क्षति) में गिना जाता है।

गौरेया को मारने के लिए उन्होंने एक ऐसा तरीका भी अपनाया, जिसने कई देशों को हक्का बक्का कर दिया। वैज्ञानिकों ने कहा कि जब गौरेया की ऊर्जा समाप्त हो जाती है, तो वे अपने घोंसले में वापस चली जाती हैं। खाने की तलाश में उड़ाने का काम बहुत थकाने वाला होता है। पर्यावरणविदों के अनुसार, लोग इतना शोर मचाते थे कि चिड़िया घोंसले तक पहुंचने में असमर्थ होती थी और उड़ते-उड़ते थक कर मर जाती थीं। इसका प्रभाव बस गौरेया पर ही सीमित नहीं रहा, बल्कि अन्य पक्षियों को भी भुगतना पड़ा।

गौरैया जैसी पर्यावरण की रक्षा करने वाली चिड़ियों को मारने का अंजाम साल 1960 में दिखाई दिया। जिस गौरैया को किसानों का दुश्मन और अनाज खाने वाला कहकर मार दिया गया था, वो असल में टिड्डियों को खाकर फसलों की रक्षा करती थीं। 1960 में फसल बहुत कम आई क्योंकि सारे धान पर टिड्डियां लग चुकी थीं। जेडोंग को तब तक अपनी गलती समझ आ चुकी थी। अनाज पर कीटों का हमला हो गया। लोगों को यह ज्ञात हुआ कि देश में गलत फैसला लिया गया है। माओ ने चार जीवों में से गौरेया को हटा दिया और उसकी जगह खटमल को शामिल किया। गौरेया आमतौर पर कीटों और टिड्डियों को खाने का काम करती थी।

यही थी अकाल की मुख्य वजह
चीन ने प्राकृतिक संतुलन को पुनर्स्थापित करने के लिए रूस से गौरेया को आयात करने की जरूरत पड़ी। इस अभियान के दौरान सिर्फ गौरेया ही नहीं, दूसरी पक्षियों को भी आक्रमण का सामना करना पड़ा था। इसे चीन में हुए अकाल का मुख्य कारण माना गया है। हालांकि, इसके अलावा खेती-किसानी में किए गए बदलाव भी अकाल के लिए जिम्मेदार माने गए।

read more…जानिए सावन को क्यों माना जाता हैं एक पवित्र महीना

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button