मनोरंजनकवितायें और कहानियाँ

क्यों ऐसी है दुनिया?

क्यों ऐसी है दुनिया?
काल्पनिकता से भरी हुई;
जिसे सीरत से नहीं,
बस सूरत से ही मतलब है;

क्यों ढालना चाहती है,
वो सबको अपने हिसाब से,
शायद खुद को बड़ा दिखाने की,
उसकी ऐसी ही कुछ फितरत है;

हर रिश्ते को आजमा लेती है ये,
अपने फायदे के लिए,
जब, जहाँ, जैसे भी,
उसे होती कोई ज़रूरत है;

कई बार ख़ामोशी से दीमक की तरह,
स्वार्थ में खा जाती है सब रिश्तो को,
आखिर स्वार्थपूर्ति का भी,
कहीं होता कोई मुहूर्त है?

पर कैसे समझाया जाये,
इस नासमझ दुनिया को,
कि इसके नियमों से भी ऊपर कोई है,
जिसे हम कहते कुदरत हैं।

—-(Copyright@ भावना मौर्य “तरंगिणी”)—-

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