मनोरंजनकवितायें और कहानियाँ

शब्द बोलते हैं

शब्द भी बोलते हैं
अक्सर मैंने सुना है,
इन्हें सजाते हुए कितने ही,
जज़्बातों को बुना है।
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एक अरसा बीत गया,
खुद से बाते किये हुए,
बिना बंधन व जिम्मेदारियों के,
खुद के लिए जिये हुए।
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होंठों से निकले लफ्ज,
तो कोई भी सुन लेगा,
मोहब्बत तो तब समझूँ,
जब तुम मेरी खामोशियाँ सुनो।
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दर्द कि ख़ामोशी,
बस दर्द ही सुन पाता है;
सुख में रहने वाला
अक्सर, बहरा हो जाता है।
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दौड़ती है ज़िन्दगी,
और ज़िन्दगी के साथ हम,
ख्वाहिशें, फरमाइशें, जितनी भी हों,
हरदम लगती हैं कम।
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एहसासों को दफ़न करके,
जीवित ज़ज्बातों को कफ़न करके,
खुद को जीना सिखाया है,
पर सच में क्या, ऐसे भी कोई जी पाया है?
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खामोश मत रह, कुछ तो जिरह कर,
बेकार में ही सही, कुछ मशविरा कर।
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अँधेरा होने से पहले,
घर लौट आना तुम,
वापसी बहुत मुश्किल न हो,
इसलिए दूर तलक न जाना तुम।
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जीवन को समझने के लिए,
जीवन को ही खर्च करते जा रहे हैं,
कहने को तो जी रहे हैं सब,
पर, असल में तो हर पल मरते जा रहे हैं।
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सिर्फ यादों के भरोसे जीवन कटता है क्या?
दुःख भी कहीं किसी से कभी बँटता है क्या?
वैसे तो लोग साथ जीने-मरने के वादे करते हैं,
पर कहीं, मरने वाले के साथ भी कोई मरता है क्या?
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–(Copyright@भावना मौर्य “तरंगिणी”)–

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