मनोरंजनकवितायें और कहानियाँ

तुम हो…

चंद लम्हों में ही मैंने,
सदियाँ जी ली हो जैसे,
क्योंकि मेरे साथ तुम हो,
और पास तुम हो;

खामोशियों में भी मैंने,
सरगम की तान छेड़ी है,
क्योंकि मेरे साज तुम हो,
और आवाज़ तुम हो;

जाने कितनी नज़्मों में,
मैंने तुमको ढाला है,
क्योंकि मेरे एहसास तुम हो,
और अल्फ़ाज़ तुम हो;

तुम्हारे लिए ही हमेशा से,
सजना-सँवरना है मेरा,
क्योंकि मेरे ख़्वाब तुम हो,
और अंदाज़ तुम हो;

प्रेम निभाने के लिए मुझे,
किसी रस्म की है ज़रूरत नहीं,
क्योंकि मेरी हर रीति तुम हो,
और हर रिवाज़ तुम हो;

मेरे अनकहे लफ़्ज़ों को भी,
तुम आँखों से ही समझ लेते हो,
क्योंकि मेरे राज़ तुम हो,
और हमराज़ तुम हो;

तेरे प्रेम की लौ में जलकर,
तुझ पर ही मिट जाना है,
क्योंकि मेरे नियाज़ तुम हो,
और नमाज़ तुम हो;

तुमसे इतर जीने की तो,
कभी आरज़ू ही न रही है मुझे,
क्योंकि मेरे अंत तुम हो,
और आग़ाज़ तुम हो;

इक तेरे सिवा मेरे जीवन पर,
किसी और का अब हक नहीं है
क्योंकि मेरी साँस तुम हो,
और सरताज तुम हो।
★★★★★

—(Copyright@भावना मौर्य “तरंगिणी”)—

(नियाज़= तमन्ना)

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